मेरे बचपन की अमीरी का आलम कुछ ऐसा था।
मैं टूटे पलक के बाल को फूंक मार हवा में उड़ा , सारा जहाँ खरीद लेता था॥
मेरे बचपन की अमीरी का आलम कुछ ऐसा था।
मैं टूटे पलक के बाल को फूंक मार हवा में उड़ा , सारा जहाँ खरीद लेता था॥
Author:Kaushal Gajjar
Email:kgajjar20@gmail.com
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