जब दोस्ती "रुक यार, मैं चाय के पैसे दे रहा" से बढ़कर
"अबे साले चाय के पैसे दे" तक पहुँच जाये तभी सही मायने में वो दोस्ती है।
जब दोस्ती "रुक यार, मैं चाय के पैसे दे रहा" से बढ़कर
"अबे साले चाय के पैसे दे" तक पहुँच जाये तभी सही मायने में वो दोस्ती है।
Author:Kaushal Gajjar
Email:kgajjar20@gmail.com
0 comments: